आयी देखत मनमोहनकू ।
221.
आयी देखत मनमोहनकू । मोरे मनमो छबी छाय रही॥धृ०॥
मुख परका आचला दूर कियो । तब ज्योतमो ज्योत समाय रही॥२॥
सोच करे अब होत कंहा है । प्रेमके फुंदमो आय रही॥३॥
मिरा के प्रभु गिरिधर नागर । बुंदमो बुंद समाय रही॥४॥
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आयी देखत मनमोहनकू । मोरे मनमो छबी छाय रही॥धृ०॥
मुख परका आचला दूर कियो । तब ज्योतमो ज्योत समाय रही॥२॥
सोच करे अब होत कंहा है । प्रेमके फुंदमो आय रही॥३॥
मिरा के प्रभु गिरिधर नागर । बुंदमो बुंद समाय रही॥४॥