हरि तुम हरो जन की भी
15.
हरि तुम हरो जन की भीर ।
द्रोपदी की लाज राखी, चट बढ़ायो चीर ॥
भगत कारण रूप नर हरि, धरयो आप समीर ॥
हिरण्याकुस को मारि लीन्हो, धरयो नाहिन धीर ॥
बूड़तो गजराज राख्यो, कियौ बाहर नीर ॥
दासी मिरा लाल गिरधर, चरणकंवल सीर ॥
15.
हरि तुम हरो जन की भीर ।
द्रोपदी की लाज राखी, चट बढ़ायो चीर ॥
भगत कारण रूप नर हरि, धरयो आप समीर ॥
हिरण्याकुस को मारि लीन्हो, धरयो नाहिन धीर ॥
बूड़तो गजराज राख्यो, कियौ बाहर नीर ॥
दासी मिरा लाल गिरधर, चरणकंवल सीर ॥