जटा न कंथा सिंगी न श
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जटा न कंथा सिंगी न शंख ।
अलख भेख हमारा बाबू ।
झोली न पत्र न कानमें मुद्रा ।
गगनपर देख थारा ॥१॥
बावा हम तो निरंजनवासी ।
साधुसंत योगी जान लो ।
हम क्या जाने घरवासी॥धृ॥
माता न पिता, बंधु न भगिनी ।
गण गोत ओ सब न्यारा॥
काया न माया, रूप न रेखा ।
उलटा पंथ हमारा बाबा ॥२॥
धोती न पोथी, जाति न कुल ।
सहजी सहज भेख पाया॥
अनुभव पत्रिसी सिद्ध की खाही ।
उन्मनी ध्यान लगाया ॥३॥
बोध बलपर बैठा भाई ।
देखत हे तिन्हु लोक ।
उर्ध्व नयनकी उलटी पाती ।
जहॉ प्रकाश आनंद कोटी ॥४॥
भाव भगत मॉंगत भिक्षा ।
तेरा मोक्ष कीर रहा दिखाई ।
बहिनी कहे मैं दासी संतनकी ।
तेरे पर बलि जाऊ ॥५॥
