भजोरे भय्या राम गोवि
20.
भजोरे भय्या राम गोविंद हरी ॥धृ॥
जप तप साधन कछु नही लागत । खचरत नाही गठरी ॥१॥
संतत संपत सुखके कारन । ज्यासे भूल परी ॥२॥
कहत कबीरा ज्या मुख राम नही । वो मुख धूल परी ॥३॥
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भजोरे भय्या राम गोविंद हरी ॥धृ॥
जप तप साधन कछु नही लागत । खचरत नाही गठरी ॥१॥
संतत संपत सुखके कारन । ज्यासे भूल परी ॥२॥
कहत कबीरा ज्या मुख राम नही । वो मुख धूल परी ॥३॥