पानी मे मीन प्यासी ।
270.
पानी मे मीन प्यासी । मोहे सुन सुन आवत हांसी॥धृ०॥
आत्मज्ञानबिन नर भटकत है । कहा मथुरा काशी॥१॥
भवसागर सब हार भरा है । धुंडत फिरत उदासी॥२॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । सहज मिळे अविनशी॥३॥
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पानी मे मीन प्यासी । मोहे सुन सुन आवत हांसी॥धृ०॥
आत्मज्ञानबिन नर भटकत है । कहा मथुरा काशी॥१॥
भवसागर सब हार भरा है । धुंडत फिरत उदासी॥२॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । सहज मिळे अविनशी॥३॥