मन रे परसि हरि के चर
12.
मन रे परसि हरि के चरन ।
सुभग सीतल कमल- कोमल त्रिविध - ज्वाला- हरन ।
जो चरन प्रह्मलाद परसे इंद्र- पद्वी- हान ॥
जिन चरन धृव अटल कींन्हो राखि अपनी सरन ।
जिन चरन ब्राह्मांड मेंथ्यो नखसिखौ श्री भरन ॥
जिन चरन प्रभु परस लनिहो तरी गौतम धरनि ।
जिन चरन धरथो गोबरधन गरब- मधवा- हरन ॥
दास मिरा लाल गिरधर आजम तारन तरन ॥
