हम तो भुले ठाकुर जान
७.
हम तो भुले ठाकुर जाने । उम क्यौ भाइ झूट दिवाने ॥१॥
नाला अपआप सागर हुवा । काहेके कारण रोता है कूवा ॥२॥
चंदनके साती निंब हुवा चंदन । क्यौ कर रोवे देखो ए हिंगन ॥३॥
गुरु के मेहेरसे नामा भये सांधु । देखत रोने लगे जन हे भोंदू ॥४॥
