मोरे लय लगी गोपालसे
281.
मोरे लय लगी गोपालसे मेरा काज कोन करेगा ।
मेरे चित्त नंद लालछे॥धृ०॥१॥
ब्रिंदाजी बनके कुंजगलिनमो । मै जप धर तुलसी मालछे॥२॥
मोर मुकुट पीतांबर शोभे । गला मोतनके माल छे॥३॥
मिराके प्रभु गिरिधर नागर । तुट गई जंजाल छे॥४॥
281.
मोरे लय लगी गोपालसे मेरा काज कोन करेगा ।
मेरे चित्त नंद लालछे॥धृ०॥१॥
ब्रिंदाजी बनके कुंजगलिनमो । मै जप धर तुलसी मालछे॥२॥
मोर मुकुट पीतांबर शोभे । गला मोतनके माल छे॥३॥
मिराके प्रभु गिरिधर नागर । तुट गई जंजाल छे॥४॥