हरि तुम कायकू प्रीत
283.
हरि तुम कायकू प्रीत लगाई॥धृ०॥
प्रीत लगाई पर दुःख दीनो । कैशी लाज न आई॥ ह०॥१॥
गोकुल छांड मथुराकु जावू । वामे कौन बढाई॥ ह०॥२॥
मिराके प्रभु गिरिधर नागर । तुमकू नंद दुवाई॥ हरि०॥३॥
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हरि तुम कायकू प्रीत लगाई॥धृ०॥
प्रीत लगाई पर दुःख दीनो । कैशी लाज न आई॥ ह०॥१॥
गोकुल छांड मथुराकु जावू । वामे कौन बढाई॥ ह०॥२॥
मिराके प्रभु गिरिधर नागर । तुमकू नंद दुवाई॥ हरि०॥३॥