देवातरी भगतीनमो पै ह
५९.
देवातरी भगतीनमो पै होइजी । जिही सेवा साहिब भल मानइ करी नाही जाने कोइजी ॥१॥
सुमृत कथा होत नही मो पेइ कुथु तो होई अभिमानजी । जोई जोई करूसो मोही वाघई त्राही त्राही भगवानजी ॥२॥
जामे सकल जीवकी उतपती सकल जीवमे अपजी । माया मोहकरी सकल भुलाणा तू घटी घटी व्यापक बापजी ॥३॥
सो वैकुंठ कहो धो कैसा । खंडख स्वाजहा जाइन । यहु परतीती होत नही मोपे जिवंत मुगती न पाइयेन ॥४॥
मै जनजीव ब्रम्हा तू माधो विनदेख्या दु:ख पाइये । साखे सम पके हे जन नामा संगी मिलावन गाइये ॥५॥
