पायो जी म्हे तो राम
158.
पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो ॥ टेक ॥
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो ॥
जनम जनम की पूंजी पाई, जग मे सभी खोवायो ॥
खायो न खरच चोर न लेवे, दिन-दिन बढ़त सवायो ॥
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो ॥
"मिरा" के प्रभु गिरधर नागर, हरस हरस जश गायो ॥
