आली रे मेरे नैणा बाण
318.
आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी ।
चित्त चढ़ो मेरे माधुरी मूरत उर बिच आन अड़ी ।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारू अपने भवन खड़ी॥
कैसे प्राण पिया बिन राखू जीवन मूल जड़ी ।
मिरा गिरधर हाथ बिकानी लोग कहै बिगड़ी॥
318.
आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी ।
चित्त चढ़ो मेरे माधुरी मूरत उर बिच आन अड़ी ।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारू अपने भवन खड़ी॥
कैसे प्राण पिया बिन राखू जीवन मूल जड़ी ।
मिरा गिरधर हाथ बिकानी लोग कहै बिगड़ी॥