कैसे तीरत बहु कुटील
६७.
कैसे तीरत बहु कुटील भयो । कली कह चीहन देसी नही नडीयो ॥१॥
कैसी सेवा कैसे ध्यान । जैसे उजल बग उनमान ॥२॥
भाव भुजंग भणयो हारी । सुरतीसी बाणा मती मजारी ॥३॥
नामदेव भणे बहु इही गुणी बाध्य । डाईणी घ्रभ सकल गजर वाध्य ॥४॥
६७.
कैसे तीरत बहु कुटील भयो । कली कह चीहन देसी नही नडीयो ॥१॥
कैसी सेवा कैसे ध्यान । जैसे उजल बग उनमान ॥२॥
भाव भुजंग भणयो हारी । सुरतीसी बाणा मती मजारी ॥३॥
नामदेव भणे बहु इही गुणी बाध्य । डाईणी घ्रभ सकल गजर वाध्य ॥४॥