मन अटकी मेरे दिल अटक
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मन अटकी मेरे दिल अटकी । हो मुगुटकी लटक मन अटकी॥धृ०॥
माथे मुकुट कोर चंदनकी । शोभा है पीरे पटकी॥ मन०॥१॥
शंख चक्र गदा पद्म बिराजे । गुंजमाल मेरे है अटकी॥ मन०॥२॥
अंतर ध्यान भये गोपीयनमे । सुध न रही जमूना तटकी॥ मन०॥३॥
पात पात ब्रिंदाबन धुंडे । कुंज कुंज राधे भटकी॥ मन०॥४॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे । सुरत रही बनशी बटकी॥ मन०॥५॥
फुलनके जामा कदमकी छैया । गोपीयनकी मटुकी पटकी॥ मन०॥६॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । जानत हो सबके घटकी॥ मन अटकी०॥७॥
