चालो अगमके देस कास द
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चालो अगमके देस कास देखत डरै ।
वहा भरा प्रेम का हौज हंस केल्या करै॥
ओढ़ण लज्जा चीर धीरज को घांघरो ।
छिमता कांकण हाथ सुमत को मूंदरो॥
दिल दुलड़ी दरियाव सांचको दोवडो ।
उबटण गुरुको ग्यान ध्यान को धोवणो॥
कान अखोटा ग्यान जुगतको झोंटणो ।
बेसर हरिको नाम चूड़ो चित ऊजणो॥
पूंची है बिसवास काजल है धरमकी ।
दाता इम्रत रेख दयाको बोलणो॥
जौहर सील संतोष निरतको घूंघरो ।
बिंदली गज और हार तिलक हरि-प्रेम रो॥
सज सोला सिणगार पहरि सोने राखड़ी ।
सांवलियांसू प्रीति औरासू आखड़ी॥
पतिबरता की सेज प्रभुजी पधारिया ।
गावै दासि कर राखिया॥
