हरहर करत मीटे सब भर्
८८.
हरहर करत मीटे सब भर्मा । हरको नाम ले उत्तम धर्मा ॥१॥
हरहर करत जात कुलहरी । सो हर आंधेलेकी लकरी ॥२॥
हरे नमस्ते हरेनम: हरहर कत नही दु:खजन । हर हरनाखुष हरे प्राण आजिल कियो बैकुंठे थान ॥३॥
सुवा पढावत गणका तरी । सो हर नैनोकी पुतरी ॥४॥
हरहर करत पूतना तरी । बाल घातनी कपटे भरी ॥५॥
स्मरण द्रोपद सुत धरी । गौतमसती शिला निसतरी ॥६॥
केसी कंस मथन जिन किया । जिया दान कालीको दिया ॥७॥
परणेव नामा ऐसो हरी । जस जपत भये अपदा डरी ॥८॥
