गली तो चारो बंद हुई
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गली तो चारो बंद हुई हैं, मै हरिसे मिलूँ कैसे जाय ॥
ऊंची-नीची राह रपटली, पांव नही ठहराय ।
सोच सोच पग धरूँ जतन से, बार-बार डिग जाय ॥
ऊंचा नीचा महल पिया का म्हांसूँ चढ्यो न जाय ।
पिया दूर पथ म्हारो झीणो, सुरत झकोला खाय ॥
कोस कोस पर पहरा बैठया, पैग पैग बटमार ।
हे बिधना कैसी रच दीनी दूर बसायो लाय ॥
मिरा के प्रभु गिरधर नागर सतगुरु दई बताय ।
जुगन-जुगन से बिछड़ी मिरा घर मे लीनी लाय ॥
