दास अनंत मेरो निजरूप
७१.
दास अनंत मेरो निजरूप । दर्शन निमष तापत्रय मोचन परसन मुक्त क्रत ग्रहे कूप ॥१॥
मेरी बांधी भक्त झुडावे बोधे भक्त न छुटे मोहे । एक समय मोको ग्रहे बांधे तो फिर मुपे जबाब न होये ॥२॥
मै गुणबंद सकलकी जीवन मेरी जीवन मेरे दास । नामदेव जाके जी ऐसी तैसो ताको प्रेम प्रगास ॥३॥
