माई म्हारी हरिजी न ब
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माई म्हारी हरिजी न बूझी बात ।
पिंड मांसू प्राण पापी निकस क्यू नही जात॥
पट न खोल्या मुखा न बोल्या, सांझ भई परभात ।
अबोलणा जु बीतण लागो, तो काहे की कुशलात॥
सावण आवण होय रह्यो रे, नही आवण की बात ।
रैण अंधेरी बीज चमंकै, तारा गिणत निसि जात॥
सुपन मे हरि दरस दीन्हों, मै न जान्यू हरि जात ।
नैण म्हारा उघण आया, रही मन पछतात॥
लेइ कटारी कंठ चीरू, करूंगी अपघात ।
मिरा व्याकुल बिरहणी रे, काल ज्यू बिललात॥
