तुम सुणौ दयाल म्हारी
83.
तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी॥
भवसागर मे बही जात हौं, काढ़ो तो थारी मरजी ।
इण संसार सगो नहि कोई, सांचा सगा रघुबरजी॥
मात पिता औ कुटुम कबीलो सब मतलब के गरजी ।
मिरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगाओ थारी मरजी॥
83.
तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी॥
भवसागर मे बही जात हौं, काढ़ो तो थारी मरजी ।
इण संसार सगो नहि कोई, सांचा सगा रघुबरजी॥
मात पिता औ कुटुम कबीलो सब मतलब के गरजी ।
मिरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगाओ थारी मरजी॥