राग सिंध भैरवी
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राग सिंध भैरवी
म्हांरे घर होता जाज्यो राज ।
अबके जिन टाला दे जाओ, सिर पर राखू बिराज॥
म्हे तो जनम जनम की दासी, थे म्हांका सिरताज ।
पावणडा म्हांके भला ही पधार्या, सब ही सुधारण काज॥
म्हे तो बुरी छा थांके भली छै, घणोरी तुम हो एक रसराज ।
थांने हम सब ही की चिंता, तुम सबके हो गरीबनिवाज॥
सबके मुगट सिरोमणि सिरपर, मानी पुन्यकी पाज ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर, बांह गहेकी लाज॥
