बन जाऊ चरणकी दासी रे
249.
बन जाऊ चरणकी दासी रे । दासी मै भई उदासी॥धृ०॥
और देव कोई न जाणू । हरिबिन भई उदासी॥१॥
नही न्हावू गंगा नही न्हावू जमुना । नही न्हावू प्रयाग कासी॥२॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । चरनकमलकी प्यासी॥३॥
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बन जाऊ चरणकी दासी रे । दासी मै भई उदासी॥धृ०॥
और देव कोई न जाणू । हरिबिन भई उदासी॥१॥
नही न्हावू गंगा नही न्हावू जमुना । नही न्हावू प्रयाग कासी॥२॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । चरनकमलकी प्यासी॥३॥